
मै संगठित दृढ़ निश्चय की गृहिणी ,मेरा जीवन नित्य रचता कथा
बस ये ही स्पष्ट नहीं है, इसे व्यंग्य कहूं या व्यथा ।।
निर्णय लेने का गौरव मुझको ही प्राप्त है
मेरा प्रभाव घर के हर कोने में व्याप्त है
किसमें साहस है जो मुझसे जीत जाए संवाद में
बस हार जाती हूं प्रतिदिन एक ही विवाद में
कि मेरी कर्मशाला में आज क्या क्या पकना है
किसके अधर खिलेंगे और किसने समझौता चखना है ।।
आज फुल्का जल गया , ईर्ष्या से काला पड़ गया
इससे हटकर ध्यान मेरा हलवे पर जो पड़ गया
मीठे हलवे के कारण,रूठे फुल्के को मनाना पड़ा
अनुरोध तो सबसे किया था, अंत में मुझको ही खाना पड़ा।।
चांद सा उजला मक्खन, छाछ में हिंडोले खाता सा
मेरी वक्र काया और अपनी कोमलता पर इठलाता सा
ठगी सी इच्छाशक्ति मेरी, ये अपनी विजय मनाता सा
उस अबला ने कर पुनः समर्पण , इस छलिये का आलिंगन कर लिया
और आज करूंगी तेरा अंतिम दर्शन,एक बार फिर से प्रण लिया ।।
मेरी पाक शाला के हर पात्र को भी पता है कि अमुक शाक में कितने मसाले डलते हैं
और स्वाद के जिज्ञासुओं को भी ये पता है कि तृप्त होकर भी तानो के तीर कैसे चलते हैं
मैंने परोसा स्वाद को, उन्होंने उलाहनाओ को परोस दिया
मेरे अनुभव को प्रयास कह के,आत्मविश्वास ही डुबो दिया।।
पराजय के भय से युद्ध ना करे ,ऐसा तो कोई वीर नहीं
लज्जा के कारण प्रयत्न ना हो, ऐसे तो हम अधीर नहीं
अरे !! पुस्तकों पोथियों में क्यों ढूंढ़ते हो प्रेरणा
देखो शस्त्र उठा लिए फिर से ,चाहे लाख हो अवहेलना
मेरे हाथों में फिर से सज्जित है – – मेरी कढ़ाई , कर्रछी ,तवा और बेलना ।।